✨ Sanskrit Edition (संस्कृतम्)
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श्री शिव चालीसा (संस्कृतम्)
नित्य नियम से प्रातःकाल अथवा प्रदोष काल में इस पावन चालीसा का पाठ करने से भगवान आशुतोष शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
॥ अथ श्री शिव चालीसा ॥
॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मङ्गल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
॥ चौपाई ॥
जय गिरिजापति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अङ्ग गौर शिर गङ्ग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मुनि मोहे॥
मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अङ्ग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत शुचि भाल। करत सदा शत्रुन क्षय काला॥
नन्दि भृङ्गी सङ्ग महत बिराजे। शम्भु नाथ की जय धुन बाजे॥
शीतल मन्द सुगन्ध सुहावन। सन्तन के मन मोद बढ़ावन॥
देव दनुज सब शीश नवावैं। नारद सारद ध्यान लगावैं॥
सदा शम्भु सन्तन के त्राता। जय जय जय जग के पितु माता॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ताको होत सदा सुखदाई॥
अष्ट सिद्धि नव निधि फल पावै। शम्भु नाथ के चरण समावै॥
॥ दोहा ॥
नित नेम करि प्रातः ही, पाठ करै चालीस।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसिर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥